हर साल दिल्ली पुलिस, सीआईएसएफ, सीआरपीएफ समेत दूसरे पैरा मिलिट्री फोर्सेज के बैंड भी अपनी प्रस्तुति देते हैं। और लोगों को देशभक्ति के भावों से सराबोर कर देते हैं। बीटिंग रिट्रीट कार्यक्रम पहली बार साल 1952 में आयोजित किया गया था। इस दौरान दो चरणों में कार्यक्रम कायोजन किया गया था। जानकारी के मुताबिक एक समारोह रीगल सिनेमा के सामने मैदान में और दूसरा लालकिले के मैदान में हुआ था। इसकी खासियत यह थी कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की मृत्यु के बाद सेना के बैंड ने उनकी पसंद को ही चुना। सेना के बैंड ने महात्मा गांधी के मनपसंद गीत अबाइड विद मी की धुन बजाई थी। और यह धुन अब तक हर साल बजाई जाती है। जबकि साल 1953 में पहली बार गणतंत्र दिवस परेड में लोक नृत्य और आतिशबाजी को शामिल किया गया था। जानकार बताते हैं कि उस साल रामलीला मैदान आतिशबाजी का गवाह बना था। साल 1953 में ही नॉर्थ ईस्ट के त्रिपुरा, असम और तत्कालीन नेफा (अरुणाचल प्रदेश) के आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों ने भी परेड में हिस्सा लिया था। गणतंत्र दिवस परेड और बीटींग रिट्रीट समारोह देखने के लिए अब टिकट लेने की परंपरा है। इस परंपरा की शुरूआत साल 1962 में शुरू हुई थी। 1962 से ही गणतंत्र दिवस परेड की लंबाई को भी बढ़ाकर छह मील कर दिया गया था। लेकिन 1962 की भारत-चीन लड़ाई के कारण 1963 के परेड का आकार छोटा कर दिया गया था। बता दें कि बीटिंग रिट्रीट का मतलब होता है कि इस कार्यक्रम के साथ ही सेना अपने अपने बंकरों को लौट जाएगी।
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Monday, 29 January 2018
बीटिंग रिट्रीट तब और अब
हर साल दिल्ली पुलिस, सीआईएसएफ, सीआरपीएफ समेत दूसरे पैरा मिलिट्री फोर्सेज के बैंड भी अपनी प्रस्तुति देते हैं। और लोगों को देशभक्ति के भावों से सराबोर कर देते हैं। बीटिंग रिट्रीट कार्यक्रम पहली बार साल 1952 में आयोजित किया गया था। इस दौरान दो चरणों में कार्यक्रम कायोजन किया गया था। जानकारी के मुताबिक एक समारोह रीगल सिनेमा के सामने मैदान में और दूसरा लालकिले के मैदान में हुआ था। इसकी खासियत यह थी कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की मृत्यु के बाद सेना के बैंड ने उनकी पसंद को ही चुना। सेना के बैंड ने महात्मा गांधी के मनपसंद गीत अबाइड विद मी की धुन बजाई थी। और यह धुन अब तक हर साल बजाई जाती है। जबकि साल 1953 में पहली बार गणतंत्र दिवस परेड में लोक नृत्य और आतिशबाजी को शामिल किया गया था। जानकार बताते हैं कि उस साल रामलीला मैदान आतिशबाजी का गवाह बना था। साल 1953 में ही नॉर्थ ईस्ट के त्रिपुरा, असम और तत्कालीन नेफा (अरुणाचल प्रदेश) के आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों ने भी परेड में हिस्सा लिया था। गणतंत्र दिवस परेड और बीटींग रिट्रीट समारोह देखने के लिए अब टिकट लेने की परंपरा है। इस परंपरा की शुरूआत साल 1962 में शुरू हुई थी। 1962 से ही गणतंत्र दिवस परेड की लंबाई को भी बढ़ाकर छह मील कर दिया गया था। लेकिन 1962 की भारत-चीन लड़ाई के कारण 1963 के परेड का आकार छोटा कर दिया गया था। बता दें कि बीटिंग रिट्रीट का मतलब होता है कि इस कार्यक्रम के साथ ही सेना अपने अपने बंकरों को लौट जाएगी।
Thursday, 25 January 2018
चीन को रास नहीं आस रही भारत-आसियान दोस्ती
गणतंत्र दिवस से पहले चीन ने डोकलाम को लेकर दिया बयान
चीन और आसियान देशों के बीच है 36 का आंकड़ा
भारत अपना 69वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। इस मौके को और बेहतर बनाने और एशिया के साथ-साथ दुनिया में अपनी छाप छोडऩे के लिए भारत ने आसियान देशों को निमंत्रित किया है। ऐसे में 26 जनवरी को आसियान के दस देशों के राष्ट्राध्यक्ष विशिष्ट अतिथि के तौर पर राजपथ से आधुनिक हिंदुस्तान की झलक देखेंगे। शायद यही वजह है कि चीन ऐसे समय में जानबूझकर भारत के विरूद्ध बयानबाजी कर रहा है। ऐसे ही एक बयान में चीन को एक बार फिर से डोकलाम की याद आ गई और चीन ने उसे अपना हिस्सा बता दिया। चीन की सेना की ओर से 17 जनवरी को दिए डोकलाम को विवादित क्षेत्र करार देने संबंधी सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत के बयान की आलोचना की गई है। चीनी सेना ने कहा कि डोकलाम गतिरोध जैसी घटनाओं से बचने के लिए 73 दिन के गतिरोध से भारत को सबक लेना चाहिए। लेकिन एक बार फिर से चीन यह भूल गया कि पीछे चीनी सैनिकों को हटना पड़ा था। इसमें भारत की कुटनीतिक जीत हुई थी।कहा जा रहा है कि चीनी सेना की ओर से जारी यह बयान यूं ही नहीं आया है। दरअसल, चीन को भारत और आसियान देशों की दोस्ती रास नहीं आ रही है। जिसकी खुन्नस निकालने के लिए ही चीनी सेना की ओर से ऐसा बयान आया है। बता दें कि गणतंत्र दिवस समारोह 2018 के लिए भारत की ओर से आसियान (एसोसियशन ऑफ साउथ ईस्ट नेशंस) देशों के सभी राष्ट्राध्यक्षों को मुख्य अतिथि के तौर पर शिरकत करने के लिए आमंत्रित किया गया है। इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब गणतंत्र दिवस समारोह पर एक साथ दस देशों के राष्ट्राध्यक्षों को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया है। कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, ब्रुनेई, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम के राष्ट्राध्यक्ष भारत आ भी चुके हंै।
आसियान देशों से चीन का है 36 का आंकड़ा
एशिया में कई मामलों को लेकर आसियान देशों का चीन से 36 का आंकड़ा है। यही वजह है कि आसियान देशों की चीन के साथ नहीं बनती। साउथ चाइना सी को लेकर आसियान के कुछ देशों का चीन से विवाद है।चीन इस पर अपना अधिकार जताता रहा है। जबकि यह जलक्षेत्र दुनिया भर में समुद्री कारोबार के लिए अहम है। भारत इस इलाके में खुली आवाजाही और कारोबार का समर्थन करता है। ऐसे में एशिया में चीन का दबदबा कम करने को लेकर भी भारत के साथ बेहतर संबंध चाहते हैं। यहां सबसे खास बात यह है कि भारत का किसी भी आसियान देश के साथ सीमा को लेकर कोई विवाद नहीं है।
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