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Sunday, 13 January 2019

दौड़ाए जा रहे हैं 20 साल पुरानेे वाहन

12 Jan 2019, Punjab Kesari


- एनजीटी ने दिए कार्रवाई के निर्देश
- कार्रवाई करे दिल्ली ट्रैफिक पुलिस-ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट

कोर्ट के आदेशों की धज्जियां उड़ाते हुए दिल्ली में 20 साल पुराने वाहन दौड़ाए जा रहे हैं। बावजूद इसके काला धुआं छोड़ रहे इन वाहनों पर न तो दिल्ली ट्रैफिक पुलिस की नजर है और न ही ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट की। रजिस्ट्रेशन खत्म यानि सडक़ों पर चलने की तय समय सीमा खत्म होने के बाद भी वाहन दौड़ाए जा रहे हैं। जिससे वे काला धुआं छोड़ रहे हैं और वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है। ऐसेे वाहन साउथ दिल्ली के जंगपुरा इलाके में दौड़ाए जा रहे हैं। इन्हीं तथ्यों को आधार बनाकर एनजीटी को इसकी शिकायत की गई। पत्र द्वारा भेजे गए शिकायत को एनजीटी ने अर्जी के तौर पर स्वीकार किया है। पूरे मामले में एनजीटी ने संबंधित एजेंसियों को सख्त कार्रवाई करने के लिए निर्देशित किया है।

दिल्ली पुलिस कमिश्नर- ट्रांसपोर्ट सेक्रेटरी करे कार्रवाई
एनजीटी को दी गई जानकारी में शिकायतकर्ता ने बकायदा उन वाहनों यानि थ्री व्हीलरों के रजिस्ट्रेशन नंबरों की लिस्ट भी भेजी है। लिस्ट के मुताबिक इलाके में लगभग एक दर्जन ऐसे वाहन अवैध तौर पर चलाए जा रहे हैं। यह भी बताया गया है कि ये वाहन काला धुआं उगलते हुए निकलते हैं तो लोगों को मुंह पर कपड़ा लगाना पड़ता है। मामले की गंभीरता को देखते हुए एनजीटी ने साउथ ईस्ट डिस्ट्रीक के डीसीपी (ट्रैफिक) और रिजनल ट्रांसपोर्ट ऑफिसर को कार्रवाई करने के लिए निर्देशित किया है। इसके लिए एक माह का समय दिया गया है। एनजीटी चेयरपर्सन जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की बेंच ने ऑर्डर के अनुपालन के लिए ऑर्डर की कॉपी दिल्ली पुलिस कमिश्नर और ट्रांसपोर्ट सेक्रेटरी को भी भेजने के लिए निर्देश दिया है।

प्रबंधित हैं 15 साल पुराने वाहन
बता दें कि 29 अक्टूबर 2018 को दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में 15 साल पुराने पेट्रोल और 10 साल पुराने डीजल वाहनों पर रोक लगाने को कहा था। सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट को आदेश दिया था कि वह यह घोषणा जारी करे कि अगर पुराने प्रतिबंधित वाहन सडक़ पर चलते दिखाई देते हैं तो उन्हें जब्त कर लिया जाएगा। जबकि 18 जुलाई 2016 को ही एनजीटी ने दिल्ली में 10 साल पुरानी डीजल गाडिय़ों पर बैन के आदेश दिए थे।

Monday, 29 January 2018

बीटिंग रिट्रीट तब और अब


हर साल दिल्ली पुलिस, सीआईएसएफ, सीआरपीएफ समेत दूसरे पैरा मिलिट्री फोर्सेज के बैंड भी अपनी प्रस्तुति देते हैं। और लोगों को देशभक्ति के भावों से सराबोर कर देते हैं। बीटिंग रिट्रीट कार्यक्रम पहली बार साल 1952 में आयोजित किया गया था। इस दौरान दो चरणों में कार्यक्रम कायोजन किया गया था। जानकारी के मुताबिक एक समारोह रीगल सिनेमा के सामने मैदान में और दूसरा लालकिले के मैदान में हुआ था। इसकी खासियत यह थी कि  राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की मृत्यु के बाद सेना के बैंड ने उनकी पसंद को ही चुना। सेना के बैंड ने महात्मा गांधी के मनपसंद गीत अबाइड विद मी की धुन बजाई थी। और यह धुन अब तक हर साल बजाई जाती है। जबकि साल 1953 में पहली बार गणतंत्र दिवस परेड में लोक नृत्य और आतिशबाजी को शामिल किया गया था। जानकार बताते हैं कि उस साल रामलीला मैदान आतिशबाजी का गवाह बना था। साल 1953 में ही नॉर्थ ईस्ट के त्रिपुरा, असम और तत्कालीन नेफा (अरुणाचल प्रदेश) के आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों ने भी परेड में हिस्सा लिया था।  गणतंत्र दिवस परेड और बीटींग रिट्रीट समारोह देखने के लिए अब टिकट लेने की परंपरा है। इस परंपरा की शुरूआत साल 1962 में शुरू हुई थी। 1962 से ही गणतंत्र दिवस परेड की लंबाई को भी बढ़ाकर छह मील कर दिया गया था। लेकिन 1962 की भारत-चीन लड़ाई के कारण 1963 के परेड का आकार छोटा कर दिया गया था। बता दें कि बीटिंग रिट्रीट का मतलब होता है कि इस कार्यक्रम के साथ ही सेना अपने अपने बंकरों को लौट जाएगी।




Monday, 22 January 2018

Bawan Fire, Civic Bodies & Action Plan

आग की घटना रोकने के लिए निगम के पास नहीं है कोई एक्शन प्लान
-निगम ने शुरु की थी प्लास्टिक, रबड़ आदि के गोदामों पर सख्त कार्रवाई की कवायद
-जगह-जगह आग लगने की घटना के बाद हाउस में लाया गया था प्रस्ताव

बवाना में लगी आग की घटना ने एक बार फिर सीविक एजेंसियों की कार्यशैली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। हालांकि पहले भी कई आग की घटनाओं के बाद निगम ने आग की वजह बनने वाले व्यापारों पर कार्रवाई की बात तो कही थी। लेकिन वोटबैंक की राजनीति के कारण इन व्यापारों पर किसी भी प्रकार की कोई सख्त कार्रवाई नहीं की गई। यहीं वजह है कि बवाना जैसे इलाके में फैक्टी में आग लगी और कई जानें मौत का शिकार हो गई।
जानकारी के मुताबिक दिल्ली के विभिन्न इलाकों में खास तौर पर बाहरी व देहात दिल्ली में जगह-जगह प्लास्टिक, रबड़ आदि के गोदाम बने हुए हैं। जोकि बिना किसी एजेंसी की अनुमति के धड़ल्ले से चल रहे हैं। दरअसल, नॉर्थ एमसीडी ने इस तरह के गोदामों पर सख्त कार्रवाई का ऐलान भी किया था लेकिन निगम की ये मुहिम सिर्फ कागजों में ही सिमटकर रह गई और नतीजा बवाना में लगी आग की घटना में मारे गए लोगों के रूप में सामने है।
बता दें कि साल 2016 के नवंबर माह के दौरान नॉर्थ एमसीडी हाउस में तत्कालीन कमिश्नर प्रवीण कुमार गुप्ता ने आकस्मिक दुर्घटनाओं पर रिपोर्ट पेश करते हुए इस तरह के गोदामों में आग लगने की घटना की जानकारी दी थी। जिसके बाद हाउस में यह मुद्दा बड़े ही जोर-शोर से उठाया गया था। हाउस में जवाब मांगा गया था कि इस तरह के गोदामों पर कार्रवाई करने का अधिकार किस एजेंसी के पास है। इसके जवाब में तत्कालीन अडिश्नल कमिश्नर संजय गोयल ने हाउस को जानकारी दी थी कि इन पर कार्रवाई करने का अधिकार निगम के क्षेत्राधिकार में ही आता ही। साथ ही यह जानकारी भी दी थी कि इन लोगों के पास ट्ऱेड लाइसेंस नहीं होता है और न ही ऐसा कोई नियम है जिसके तहत इन्हें लाइसेंस के दायरे में लाया जाए।
इसके बाद निगम ने आवासीय क्षेत्रों में जहां पर बड़ी संख्या में लोग निवास करते हैं, ऐसी जगहों से गोदामों का खाली कराने का निर्णय लिया था। कहा गया था कि यहां पर इन गोदामों में आग लगने से बड़ी दुर्घटना की संभावना बनी रहती है। इसलिए कार्रवाई करने की सख्त जरूरत है। निगम ने यह भी कहा था कि ऐसा ट्रेड करने वालों को नोटिस जारी कर अलॉटेड पीवीसी मार्केटों में जाने को कहा जाएगा। इसके लिए बकायादा उन्हें समय भी दिया जाएगा। इसके अलावा ऐसा न करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी लेकिन इस फैसले को अमल में नहीं लाया जा सका और आज भी दुर्घटना की संभावना जस की तस बरकरार है।